अब मेरी साँसो में समाई भी बोहोत लगती है,
ताज्जुब ये हैं के पराई भी बोहोत लगती है,
इसी काशमश में करता रहा प्यार मैं उसको,
वो मेरे ख्वाबो की परछाई भी बोहोत लगती है।
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हिचकी
ये जो सुना है मैंने गर सच है तो, हिचकियाँ बोहोत परेशां करती होंगी उसको।
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कर भी लेंगे गर फ़तेह ऊँचे पहाड़ को हम, क्यूँ प्यार फिर भी तेरा मुश्किल नज़र आया। लेखक-रिशी गोयल
Good 👍
ReplyDelete😍😍👌👌
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