एक हुनर था मुझमे, वो भी उसने छीन लिया,
सोच पे मेरी पर्दा डाला, और कलम को छीन लिया,
हर वक़्त भटकता रहता हूँ कुछ लिखने को कुछ पढ़ने को,
आँखों का जादू छीन लिया, लिखने का जज्बा छीन लिया।
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हिचकी
ये जो सुना है मैंने गर सच है तो, हिचकियाँ बोहोत परेशां करती होंगी उसको।
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कर भी लेंगे गर फ़तेह ऊँचे पहाड़ को हम, क्यूँ प्यार फिर भी तेरा मुश्किल नज़र आया। लेखक-रिशी गोयल
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