कल-कल बेहते दरिया से किनारा रूठ सकता है,
जिस्म से मेरे साँसों का सहारा छूट सकता है,
गर तुम चली गयी हाथो से मेरे हाथ छुड़ा कर के,
हमारे साथ देखे सपनो का सितारा टूट सकता है।
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हिचकी
ये जो सुना है मैंने गर सच है तो, हिचकियाँ बोहोत परेशां करती होंगी उसको।
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कर भी लेंगे गर फ़तेह ऊँचे पहाड़ को हम, क्यूँ प्यार फिर भी तेरा मुश्किल नज़र आया। लेखक-रिशी गोयल
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